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बाल-श्रम और समाधान

राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं द्वारा बच्चों के बेहतर भविष्य के लिए आए दिन अनेक प्रकार के सर्वेक्षणों पर आधारित घोषणा-पत्र एवं नीति-प्रारूप तैयार होते रहते हैं। परन्तु अभी भी स्थिति में शायद ही कोई सुधार हुआ है। सारी दुनिया में और विशेषकर भारत जैसे विकासशील देश में बहुत संख्या में बच्चे तंगी और बदहाली का जीवन जीने के लिए बाध्य हैं। लाखों बच्चे सड़क के किनारे दावों से लेकर खतरनाक कारखानों तक और घर के कूड़ा-करकट की सफाई से लेकर सार्वजनिक कूड़ादानों की सफाई तक के कार्यों में लगे हुए हैं। यद्यपि इनकी सामाजिक जीवन में इनकी योगदान प्रत्यक्ष रूप में नजर आता है। लेकिन उस योगदान के बावजूद भी लोग इन बच्चों को उपेक्षा भरी नजरों से देखते हैं। इसमें इस बात की पूरी आशंका रहती है कि इस भेदभाव से पैदा हुई कुंठा समाज को नुकसान पहुँचाने जैसी उपागमों को अपनाने के लिए न प्रेरित कर दे।
बाल-श्रम का सबसे मूलभूत एवं मुख्य कारण है- गरीबी। आश्रित बच्चों की बड़ी तादाद, अभिभावकों की निरक्षरता, अनियमित एवं अल्प आय और आजीविका के स्थायी स्रोतों का अभाव आदि परिस्थितियाँ हैं, जो उन्हें विद्यालय जाने के बजाय श्रम-स्थल पर पहुँचा देती है। कुछ अध्ययनों से यह परिणाम देखने में आया है कि बाल-श्रम की स्थितियाँ गरीब एकल परिवार से ज्यादा उभरकर सामने आयी है। इसके अलावा कुछ ऐसे उदाहरण भी हैं, जिनमें बच्चों के काम करने की वजह गरीबी न होकर, अभिभावकों का उपेक्षा भाव है। अप्रभावी कानून और उससे भी बढ़कर राजनीतिक इच्छाशक्ति का अभाव भी इस समस्या की वजह है। इस पर नियंत्रणा लिए संस्थाओं में दायित्व निर्वाह की भावना का अभाव तो देखा ही गया है। ऐसे प्रयोजनों के लिए संसाधन भी उपलब्ध नहीं कराए जाने। कभी-कभी अभिभावक अपना ऋण चुकाने के लिए भी बच्चों को काम पर लगा देते हैं।

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