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जीवन और साहित्य

जीवन एक गहरा सागर है और साहित्य इस गहरे सागर का अवलोकन करता है। किसी सागर का अवलोकन किस प्रकार किया जाए, यह सभी साहित्यकारों का अलग-अलग दृष्टिकोण है। यदि किसी का दृष्टिकोण आदर्शपूर्ण, अनुरागी, प्रकाशवान, संवेदनशील और अनुकरणीय है तो वही ‘उत्कृष्ट साहित्य’ कहलाता है। वहीं दूसरी तरफ यदि किसी का दृष्टिकोण संकुचित, ठहरा हुआ, ग़मगीन, अश्लील व अभद्र है तो वह ‘निकृष्ट साहित्य’ कहलाता है।
साहित्य जीवन का ही एक दर्पण है। हमारी पृथ्वी पर सैंकड़ों व्यक्ति जीवन जी रहे हैं। इन सभी कि अपनी-अपनी मान्यताएँ, स्वाभिमान, अपने-अपने लक्ष्य, अपनी-अपनी ताकतें और कमजोरियाँ हैं। यही सब चीजें जब लिखित रूप ले लेती है, तो वह साहित्य बन जाता है। साहित्य एक प्रभावकारी माध्यम है जिसमें कविता, उपन्यास, कहानी, नाटक और लेख सब कुछ विद्यमान होते हैं। यह सारे मिलकर जीवन को संक्षेप में बताते हैं। यह एक तरफ तो जीवन को मूल्यवान बनाते हैं और दूसरी तरफ इसके महत्व से मनुष्य के जीवन की उपलब्धियों के बारे में बताते हैं कि अपने जीवन के मूल्य के अनुरूप उसने क्या-क्या पा लिया है।

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