क्या सौन्दर्यबोध परिस्थिति से प्रभावित होता है?


धूप में निकलो घटाओं में नहाकर देखो
ज़िंदगी क्या है किताबों को हटाकर देखो
निदा फ़ाज़ली
वाशिंगटन पोस्ट ने जानना चाहा,
सुंदरता क्या है? ऐसा कुछ जिसे मापा जा सके (बकौल गॉट्फ़्राइड लेबनीज़), या केवल एक राय (बकौल डेविड ह्यूम), या फिर जैसा इमैन्युएल कांट ने कहा था कि थोड़ी थोड़ी दोनों, पर उसपर दर्शक की तात्कालिक मानसिक अवस्था का भी प्रभाव होता है?
इस सवाल का बेहतर जवाब जानने के लिए पोस्ट ने एक मज़ेदार प्रयोग किया.

वाशिंगटन के व्यस्ततम मेट्रो स्टेशनों में से एक है ल'फ़ाँत प्लाज़ा. यहाँ अक्सर सुबह के व्यस्त घंटों के दौरान स्थानीय संगीतवादक वायलिन, गिटार या पियानो बजाते सुनाई दे जाते हैं. गुज़रने वाले अपनी इच्छानुसार डॉलर या चिल्लर इनकी खुली पेटी में छोड़ जाते हैं.

वाशिंगटन पोस्ट ने वहाँ बिठाया (बल्कि खड़ा किया) जोशुआ बेल को. जोशुआ दुनिया भर में ख्यातिप्राप्त वायलिन वादकों में से हैं. इस प्रयोग से तीन दिन पहले ही उन्होंने बोस्टन के सिम्फ़नी हॉल में वायलिनवादन किया था और वहाँ ठीक-ठाक सीटें भी 100 डॉलर में बिकी थीं. पोस्ट ने उनसे स्टेशन के बाहर वायलिन बजाने का आग्रह किया. ठीक उसी तरह जैसे आम स्थानीय कलाकार खड़े होकर बजाते हैं - अकेले, बिना किसी ताम-झाम के, पैसों के लिए पेटी खुली रखकर.

देखना यह था कि क्या एक विश्व-स्तरीय कलाकार, अद्भुत संगीत, और एक उत्तम वाद्य-यन्त्र का मिश्रण एक आम, काम पर जा रहे कम्यूटर के सौन्दर्यबोध को प्रभावित करेगा. क्या एक साधारण माहौल और असुविधाजनक समय में सौंदर्य बरक़रार रहेगा?

क्या हुआ यह विस्तार से जानने के लिए वाशिंगटन पोस्ट का आलेख पढ़िये. घटना की विडियो रिकॉर्डिंग भी वहीं उपलब्ध है.

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